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Tuesday, June 15, 2010

मैं कौन हूँ कब जानूंगा ?, क्या केवल अपना ही नाम ?

मैं कौन हूँ कब जानूंगा ?, क्या केवल अपना ही नाम ?
दूध पीना - हंसना - रोना - खेलना ही है मेरा काम,
जाना तो केवल अपना और परिवार के सदस्यों का नाम,
कुछ करना है तो पढ़ना है, क्योंकि जरुरतमंदो का है यह काम,
मुझे दोस्त भी मिले उनका भी था यही काम,
मैं कौन हूँ कब जानूंगा ?, क्या केवल अपना ही नाम ?

मैं कौन हूँ कब जानूंगा ?, क्या केवल अपना ही नाम ?
माता - पिता ने कहा सीखो अब कुछ अच्छे काम,
माहौल ख़राब था इसीलिए मैं सीख गया कुछ गलत काम,
खिंचा - तानी में फंस गया जीवन और मैं होने लगा नाकाम,
माता - पिता ने कहा अब लो कुछ समय ईश्वर का नाम,
मैं कौन हूँ कब जानूंगा ?, क्या केवल अपना ही नाम ?

मैं कौन हूँ कब जानूंगा ?, क्या केवल अपना ही नाम ?
अब कुछ समझ नहीं आया करना था रोजी के लिए काम,
नौकरी भी लगी पर अभी थे कुछ अच्छे और बुरे मेरे काम,
जिम्मेदारी बढने लगी और माता - पिता देने लगे मुझको ज्ञान,
शादी के लिए था मैं अब तैयार मैंने ही किये थे कुछ ऐसे इंतजाम,
मैं कौन हूँ कब जानूंगा ?, क्या केवल अपना ही नाम ?

मैं कौन हूँ कब जानूंगा ?, क्या केवल अपना ही नाम ?
शादी हो गई है अब मेरी रखना है बच्चे का नाम,
बच्चा भी अब वोही करता जो किये थे मैंने काम,
अब चिन्ता थी उसकी मुझको वो करेगा क्या काम,
मैं क्या सिखाऊंगा उसको मुझे न पता थे अपने काम,
मैं कौन हूँ कब जानूंगा ?, क्या केवल अपना ही नाम ?

मैं कौन हूँ कब जानूंगा ?, क्या केवल अपना ही नाम ?
जीवन आधा निकल गया पता न चला मुझे अपना काम,
जो देखा वोही सिखा नहीं पता था सही - गलत ज्ञान,
पहचान अभी भी थी अधूरी सही गलत थे मेरे काम,
अब कौन सिखाएगा मुझको ईश्वर तुम ही दो अब ज्ञान,
मैं कौन हूँ कब जानूंगा ?, क्या केवल अपना ही नाम ?

मैं कौन हूँ कब जानूंगा ?, क्या केवल अपना ही नाम ?
शरीर मेरा अब वो नहीं था, बूढ़ा हो गया था मैं नादान,
ईश्वर मुझे अब तुम उठालो नहीं बची हैं मुझमे जान,
मैंने तो सोच लिया कुछ नहीं इस जीवन में काम,
ईश्वर का लो नाम और करते रहो सब काम,
मैं कौन हूँ कब जानूंगा ?, क्या केवल अपना ही नाम ?

मैं कौन हूँ कब जानूंगा ?, क्या केवल अपना ही नाम ?
अंत समय करीब था अब क्या मिलेगा मुझको ज्ञान,
अलविदा दोस्तों, 
मैं कौन हूँ कब जानूंगा ?, क्या केवल अपना ही नाम ?

Tuesday, April 20, 2010

गरीब जीवन की परिस्थिति

कुछ समय शांत स्थान पर व्यतीत करने के लिए, मैं शाम के समय अपने घर से बाहर निकला और एक स्थान पर जाकर बैठ गया. कुछ समय के बाद मैंने एक सब्जी बेचने वाले को एक महिला से झगड़ते देखा, उसी पल मैंने सोचा कि मैं वहां जाकर पता करूँ कि किस बात पर महिला और सब्जी बेचने वाले में झगड़ा हो रहा हैं. लेकिन उसी वक़्त सब्जी वाला वहां से अपनी ठेली लेकर मेरी तरफ आने लगा, पीछे - पीछे वह महिला भी आने लगी, तो मुझे लगा कि यहाँ मेरी सहायता की जरुरत हैं. मैंने उस महिला से पूछा कि आप दोनों क्यों झगड़ रहे हो?

झगड़े का विषय: उस महिला ने दो दिन से सब्जी बेचने वाले का पुराना उधार नहीं चुकाया था. और उसे शाम को घर में अपने दो बच्चो और अपने पति के लिए खाना पकाना था जिसके लिए उसने 10 रुपये के आलू उधार मांगे थे. आलुओ समेत उसका कुल उधार 57 रुपये हो गया था. इस बात के लिए सब्जी वाला तैयार नहीं था.

गरीब जीवन की परिस्थिति: वह महिला उस सब्जी वाले से निवेदन कर रही थी कि वह उसके 57 रुपये कल चुका देगी, तभी मैंने भी सब्जी वाले से आग्रह किया कि वह उस महिला को 10 रुपये के आलू दे दे, सब्जी वाले ने उसे आलू दे दिए और वह वहां से चला गया. मैं भी वहा से जाने ही लगा था तभी वह महिला मुझसे आगे निकल गई, और उस महिला का बच्चा बोला कि "अम्मी मुझे भी कुछ दिलादो, अम्मी अपने बच्चे से बोली "तेरे अब्बू को एक महीने से मजदूरी नहीं मिली हैं. मैं तुझे कुछ भी नहीं दिला सकती".

ये सभी बाते मैंने सुन ली थी, मैंने उस महिला से पूछा कि आपने सब्जी वाले को कल उधार चुकाने को कहा हैं आप वह कैसे चुकाओगी. महिला ने जवाब में कहा कि अगर मैं सब्जी वाले को ऐसा नहीं कहती तो आज मेरे बच्चों के लिए खाना नहीं बन पाता.